रस (Ras) in Hindi Grammar

निष्पत्ति, साधारणीकरण एवं ध्वनि सिद्धान्त

साहित्य को पढ़ने, सुनने या नाटकादि को देखने से जो आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रसकहते हैं।

रस का सामान्य अर्थ है-आस्वाद‘ (रसस्यते आस्वाद्यते इति रसः)

अर्थात् जिससे आस्वाद मिले, वही रस है। सर्वप्रथम भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में रस के स्वरूप को स्पष्ट किया था। काव्य में रस को वही स्थान प्राप्त है जो हमारे शरीर में आत्मा को प्राप्त है। जिस तरह आत्मा के बिना शरीर का कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता, उसी तरह रस के बिना किसी कथन को काव्य नहीं कहा जा सकता। इसलिए रस को काव्य की आत्मा’ कहा जाता है। आचार्य विश्वनाथ ने काव्य को परिभाषित करते हुए–वाक्यं रसात्मकं काव्यम्कहा है।

साहित्यशास्त्र में ‘रस’ का प्रयोग ‘काव्यास्वाद’ या ‘काव्यानन्द’ के लिये हुआ है। रस का सर्वांगीण विवेचन सबसे पहले आचार्य भरत ने अपने’नाट्यशास्त्र’ में किया-विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रस निष्पत्ति:‘अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्तिहोती है। रस के चार अंग हैं-

रस सम्बन्धी विविध तथ्य

  • शृंगार रस को रसराजकहा जाता है।
  • नाटक में आठ ही रस माने जाते हैं, क्योंकि वहाँ शान्त को रस नहीं गिना जाता। भरतमुनि ने रसों की संख्या 8 मानी है।
  • शृंगार रस के व्यापक दायरे में वात्सल रसभक्तिरस आ जाते हैं इसीलिए रसों की संख्या 9 ही मानना ज्यादा उपयुक्त है।
  • रसों की संख्या 9 है। जिन्हें ‘नवरस’ कहा जाता है। मूलतः नवरसही माने जाते हैं।

रस के अंग 

रस के अंग 4 है:

स्थायी भाव है-प्रधान भाव

स्थायी भाव की संख्या 9 है।

रसों की संख्या 9 है।

विभाव के भेद 2 हैं-

1. आलम्बन विभाव

2. उद्दीपन विभाव

आलम्बन विभाव के भेद 2 है-

1 आश्रयालम्यन

2. विषयालम्बन

 उद्दीपन विभाव के भेद 4 हैं

1. आलम्बन के गुण

2. आलम्बन की चेष्टाएँ

3. आलम्बन का अलंकार

4. तटस्थ

अनुभाव का अर्थ है-भाव के पीछे उत्पन्न होने वाला।

अनुभाव के भेद 4 हैं-

1.    कायिक 2. वाचिक 3. आहार्य 4. सात्विक

सात्विक अनुभव के भेद 8 हैं-

1. स्तम्भ 2. स्वेद 3. रोमांच 4. स्वरभंग 5. कम्प 6. वैवणर्य 7. अश्रु 8. प्रलय

 

· बाद में आचार्यों ने 2 और भावों (वात्सल्य व भगवद् विषयक रति) को स्थायी भाव की मान्यता दी। इस प्रकार, स्थायी भावों की संख्या 11 तक पहुँच जाती है।

  1. स्थायी भाव : मनुष्य के हृदय में संस्कार या वासना के रूप में मूलरूप से विद्यमान रहने वाले भावों को स्थायी भाव कहते हैं। स्थायी भावों की संख्या नौ मानी गयी है। प्रत्येक स्थायी भाव से पृथक रस की निष्पत्ति होती है।
स्थायी भाव रस
1. रति श्रृंगार
2. हास हास्य
3. उत्साह वीर
4. शोक करुणा
5. क्रोध रौद्र
6. जुगुप्सा/घृणा विभस्त
7. विस्मय अद्भुत
8. भय भयानक
9. निर्वेद शांत

 

1. रति-स्त्री और पुरुष का एक-दूसरे के प्रति उत्पन्न होने वाला प्रेमपूर्ण अनुराग रति स्थायी भाव को जन्म देता है।

  1. हास-किसी व्यक्ति के रंग रूप, वाणी एवं अंगों के विकारों को देखकर उत्पन्न होने वाला भाव हास कहलाता है।
  2. शोक-किसी प्रिय वस्तु अथवा प्रिय व्यक्ति के नाश के कारण उत्पन्न होने वाली हृदय की व्याकुलता को शोक कहते है।
  3. क्रोध-किसी अपराध, विवाद या अपमान हो जाने की वजह से उत्पन्न होने वाले मनोविकार को क्रोध कहते हैं।
  4. उत्साह-मन की ऐसी उल्लासपूर्ण वृति जिसके कारण मनुष्य किसी कार्य को तेजी से करने के लिए तैयार होता है, उत्साह के भाव को जन्म देता है।
  5. भय-किसी डरावनी वस्तु को देखने या उसके विषय में सुनने से मन में भय का भाव उत्पन्न होता है।
  6. आश्चर्य-किसी अचंभित करने वाले व्यक्ति या वस्तु को देखकर मन में आश्चर्य का भाव जाग्रत होता है।
  7. जुगुप्सा-किसी घृणित वस्तु के विषय में सोचने या देखने से का भाव उत्पन्न होता है।
  8. निर्वेद-इस क्षण भंगुर संसार के प्रति वैराग्य की उत्पत्ति करने का भाव निर्वेद कहलाता है।

 

  1. विभाव

जो व्यक्ति वस्तु या परिस्थितियाँ स्थायी भावों को उद्दीप्त या जाग्रत करती हैउन्हें विभाव कहते हैं। जो व्यक्ति के हृदय में स्थित स्थायी, भावों को जाग्रत करते है और रस की प्रतीति कराते है वे विभाव कहलाते हैं। विभाव के दो भेद हैं-

(क) आलम्बन विभाव-जिस वस्तु अथवा व्यक्ति कारण व्यक्ति के इदयमें स्थित स्थायी भाव जाग्रत होते हैं, उसे आलम्बन विभाव कहते हैं. जैसे-नायक-नायिका आलम्बन विभाव है जिन्हें देखकर स्थायी भाव रति’ जाग्रत होता है। आलम्बन के भी दो भेद है-आश्रय और विषय । जिस व्यक्ति के मन में रति आदि भाव उत्पन्न होते हैं उसे ‘आश्रय’ और जिस वस्तु या व्यक्ति के लिये आश्रय के मन में भाव उत्पन्न होते हैं-उसे “विषय’ कहते हैं।

(ख) उद्दीपन विभाव-मन में जाग्रत स्थायी भाव को उद्दीप्त करने वाले भाव उद्दीपन कहलाते हैं। इनमें आलम्बन का रूप और उसकी चेष्टाये आती है। जैसे-नायिका का अति सुन्दर होना नायक के हृदय में रति स्थायी भाव को उद्दीप्त करता है। शकुन्तला को देखकर दुष्यन्त के मन में आकर्षण (रति भाव) उत्पन्न होता है।उस समय शकुन्तला की शारीरिक चेष्टायें तथा वन का मनोरम व एकान्त वातावरण दुष्यन्त के मन में रति भाव को और अधिक तीव्र करता है। अतः यहाँ शकुन्तला की शारीरिक चेष्टायें तथा वन के एकान्त वातावरण आदि को उद्दीपन विभाव कहा जाता है।

 

  1. अनुभाव

आलम्बन और उद्दीपन विभाव द्वारा जाग्रत मानसिक व शारीरिक चेष्टायें अनुभाव कहलाती है. क्योंकि इन्हीं के द्वारा व्यक्ति के हृदय में जाग्रत भावों का बोध होता है। आचार्यों ने अनुभाव के चार भेद किये हैं-कायिक, मानसिक, आहार्य और सात्विक।

(क) कायिक अनुभाव-स्थायी भाव के उद्दीप्त होने पर व्यक्ति के शारीरिक अगों की स्वाभाविक चेष्टायें कायिक अनुभाव के अन्तर्गत आती है। खुशी से आँखों में आँसू आना, लज्जा से दृष्टि झुक जाना, क्रोध से मुँह लाल हो जाना आदि कायिक अनुभाव है।

() मानसिक अनुभाव-अन्त: करण की भावना के अनुकूल मन मेंहर्ष-विषाद आदि के उद्वेलन को मानसिक अनुभाव कहते है।

(ग) आहार्य अनुभाव-वेशभूषा आदि से जो भाव व्यक्त किये जाते है, उन्हें आहार्य अनुभाव कहते हैं; जैसे-किसी भाव विशेष के लिए कृत्रिम वेशभूषा धारण करना।

(घ) सतिव्क अनुभाव-इनका सम्बन्ध हृदय से है, अतः ये व्यक्ति के वश में नहीं रहते, जैसे-शरीर का पुलकित हो उठाना या रोमांच में रोंये खड़े हो जाना आदि सात्विक अनुभाव है।

  1. संचारी भाव

आश्रय के चित्त में उत्पन्न होने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते है। इनके द्वारा स्थायी भाव और तीव्र हो जाता है। संचारी भावों कीसंख्या 33 है।

1. निर्वेद 2. ग्लानि 3. शंका
4. असूया 5. मद 6. जड़ता
7. उग्रता 8. दैत्य 9. विबोध
10. स्वपन 11. अपस्मार 12. गर्व
13. मरण 14. आलस्य 15. अमर्ष
16. निद्रा 17. अवहित्था 18. उत्सुकता
19. उन्माद 20. शंका 21. स्मृति
22. मति 23. व्याधि 24. संत्रास
25. लज्जा 26. हर्ष 27. श्रम
28. विषाद 29. धृति 30. चपलता
31. ग्लानि 32. चिंता 33. वितर्क

 

रस

  1. श्रृंगार रस

आचार्य भोजराज ने श्रृंगार को “रसराज” कहा है। यही एक ऐसा रस है जिसमें अन्य रसों के संचारी भाव भी समाहित हो जाते हैं। श्रृंगार रस का आधार स्त्री-पुरुष का पारस्परिक आकर्षण है जिसे काव्यशास्त्र में ‘रति स्थायी भाव कहते हैं। जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रति स्थायी भाव आस्वाद हो जाता है तो उसे श्रृंगार रस कहते हैं।

स्थायी भाव-रति

आलम्बन विभाव-नायक और नायिका

उदीपन विभाव-आलम्बन का सौन्दर्य, प्रकृति रमणीक उपवन, बसन्त ऋतु, चाँदनी रात, भ्रमर गुंजन, पक्षियों का कूंजन आदि ।

अनुभाव-अवलोकन, स्पर्श, आलिंगन, कटाक्ष, अश्रु आदि ।

संचारी भाव-हर्ष, जड़ता, निर्वेद, अभिलाषा, चपलता, आशा, स्मृति, रुदन, आवेग, उन्माद आदि।

(क) संयोग श्रृंगार-श्रृंगार रस में सुखद और दुखद दो प्रकार की अनुभूतियाँ होती है। इसी आधार पर इसके दो भेद किये गयेहै-संयोग श्रृंगार और वियोग शृगार।

जहाँ नायक-नायिका के संयोग या मिलन का वर्णन होता है, वहाँ संयोग शृंगार होता है। यहाँ सयोग का अर्थ है-सुख की प्राप्ति करना।

उदाहरण-

दूलह श्री रघुनाथ बने दुलही सिय सुन्दर मन्दिर माहीं।

गावति गीत सबै मिलि सुन्वरि बेद, जुवा जुरि बिप्र पढ़ाहीं।।

राम को रूप निहारति जानकि कंकन के नग की परछाही।

पाते सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही, पल टारत नाहीं।।

तुलसीदास

इस पद में स्थायी भाव ‘रति’ है। ‘राम’ आलम्बन ‘सीता’ आश्रय नग में पड़ने वाला ‘राम का प्रतिबिम्ब को देखना’,’उद्हीपन, ‘उस प्रतिबिम्ब को देखना’,‘हाथ टेकना’  अनुभाव तथा ‘हर्ष’ एवं जड़ता’ संचारी भावहै, अत: इस पद में संयोग श्रृंगार है।

(ख) वियोग श्रृंगार

एक-दूसरे के प्रेम में अनुरक्त नायक एवं नायिका के मिलन का अभाव ‘विप्रलम्भ श्रृंगार होता है।

‘कहेउ राम वियोग तब सीता।

मो सकल भए विपरीता।।

नूतन किसलय मनहूँ कृसानू।

काल-निसा-सम निसि ससि भानू।।

कुवलय विपिन कुंत बन सरिसा।

वारिद तपद तेल जनु बरिसा।।

कहेऊ ते कछु दु:ख घटि होई ।

काहि कहौं यह जान न कोई।।

स्पष्टीकरण-यहाँ राम का सीता के प्रति जो प्रेम भाव है वह ‘रति’ स्थायी भाव, राम आश्रय, सीता, आलम्बन, प्राकृतिक दृश्य उद्दीपन विभाव, कम्प, पुलक और अश्रु अनुभाव तया विषाद, ग्लानि, चिंता, दीनता आदि संचारी भाव है। अत: यहाँ वियोग श्रृंगार रस है।

 

2. हास्य रस

हास्य रस को सभी रसों से अधिक सुखात्मक माना गया है।

विकृत वेशभूषा, क्रियाकलाप, चेष्टा या वाणी देख सुनकर मन में जो विनोवजन्य उल्लास उत्पन्न होता है, उसे हास्य रस कहते हैं। किसी कविता का अनुकरण योग्यात्मक अर्थात पैरोडी का रूप भी हास्य रस उत्पन्न करता है।

स्थायी भाव-हास

आलम्बन विभाव-विकृत वेशभूषा. आकार एवं चेष्टायें

उद्दीपन विभाव-आलम्बन की अनोखी आकृति, बातचीत, चेष्टायें आदि

अनुभाव-आश्रय की मुस्कान, नेत्रों का मिचमिचाना एवं अट्टहास

संचारी भाव-हर्ष, आलस्य, निद्रा, चपलता, कम्पन, उत्सुकता आदि ।

उदाहरण-

सिगरी मग घेरि कै, चलत बीजुरी की चाल,

लरिका तो सहमि जात, वे न सहमति हैं।

लगा क्रीम पाउडर, विषु को हू मात करै,

लरिकन की ओर देखि देखि के हँसत है।

सभी ठौर उनको प्रधानता मिली है ‘वत्स’

है कैं स्वच्छन्द सब ओर विहरत है।

हम तो सोचि सोचि कै, भये हैं दूबरे से आजु

लरकिनी अगारी हमें, पाछे को करत है।

डॉ. वत्स

 

स्पष्टीकरण-आधुनिक दौर में लड़कियों की बदलती वेशभूषा को देखकर कवि ने व्यंग्य किया है। कवि उनके बनाव श्रृंगार को देखकर हतप्रभ रह गया है।

उदाहरण-

बिन्ध्य के वासी उदासी तपो व्रतधारी महाबिनु नारि दुखारे।

गौतम तीय तरी तुलसी सौ कथा सुनि में मुनिबृन्द सुखारे।।

है सिला सब चन्द्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे।

कीन्हीं भली रघुनायक जू! करुणा करि के कानन को पगु धारे।।

तुलसीदास

 

  1. वीर रस

युद्ध अथवा किसी कठिन कार्य को करने के लिय हृदय में जो उत्साह जाग्रत होता है, उससे ‘वीर रस’ की निष्पत्ति होती है। इस आधार पर चार प्रकार केवीर रस होते हैं-

  1. युद्धवीर 2. दानवीर 3. धर्मवीर 4. दयावीर

स्थायी भाव-उत्साह

आलम्बन विभाव-अत्याचारी शत्रु

उद्दीपन विभाव-शत्रु का पराक्रम, अहंकार, रणवाद्य याचक का आत्र्तनाद,यश की इच्छा आदि।

अनुभाव-रोमांच, गर्दपूर्ण उक्ति, प्रहार करना, कम्प, धर्मानुकूल आचरणआदि

संचारी भाव-जग्रता, आवेग, गर्व, चपलता, धृति, मति, स्मृति, हर्ष, उत्सुकता,असूया आदि।

उदाहरण-

साजि चतुरंग सैन अंग में उमग धरि,

सरजा शिवाजी जग जीतन चलत हैं।

भूषन भनत नाद बिहद नगारन के

नदी नद मद गैबरन के रलत है।

ऐल फैल खैल भैल खलक में गैल गैल,

गजन की ठैल पैल सैल उलसत है।

तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि,

थारा पर पारा पारावार यों हलत हैं।

कविभूषण

स्पष्टीकरण-शिवाजी की चतुरंगिणी सेना की वीरता का वर्णन किया गया है। कम्प, मद, आवेग, उन्माद आदि संचारी भाव है।

उदाहरण-

बुंदेले हर बोलो के मुँह,

हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो

झाँसी वाली रानी थी।

सुभद्राकुमारी चौहान

 

4. करुण रस

बन्धु वियोग, बन्धु-विनाश, द्रव्यनाश और प्रेमी के सदैव के लिये बिछुड़ जाने से करुण रस उत्पन्न होता है।यद्यपि दु:ख का अनुभव वियोगश्रृंगार में भी होता है, किन्तु वहाँ मिलने की आशा भी बँधी रहती है। अतः शोक स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से करुण रस की दशा को प्राप्त होता है।

उदाहरण-

अभी तो मुकुट बंधा था माथ,

हुए कल ही हल्दी के हाथ,

खुले भी न थे लाज के बोल,

खिले थे चुम्बन शून्य कपोल,

हाय रुक गया यही संसार,

बना सिन्दूर अनल अंगार,

वातहत लतिका वह सुकुमार,

पड़ी है छिन्नाधार

 

स्पष्टीकरण-इस पंक्ति में ‘विनष्ट पति आलम्बन है तथा मुकुट का द हल्दी के हाथ होना लाज के बोलो कान खुलना आदि उन है। आहत लतिका के समान नायिका का बेसहारे पड़े होना अनुनाव है तया उे विषाद दैन्य, स्मृति, जड़ता आदि संचारी भाव है।

 

 5. रौद्र रस

विरोधी पक्ष द्वारा किसी व्यक्ति, देश समाज या धर्म का अपनान या अपकर करने से उसकी प्रतिक्रिया में जो क्रोध उत्पन्न होता है वह विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से परिपुष्ट होकर आस्वाद हो जाता है और तब रस उत्पन्न होता है।

उदाहरण-

उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा।

मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा ।।

स्पष्टीकरण-यहाँ अभिमन्यु के वध का समाचार सुनकर अर्जुन के क्रोध का वर्णन किया गया है। इसमें स्थायी भाव-क्रोध, आश्रय-अर्जुन विभाव-अभिमन्यु का वध, अनुभाव-हाथ मलना, मुख लाल होना एवं तन काँपना तथा संचारी भाव उग्रता आदि है।

 

6.वीभत्स रस

घृणित वस्तुओं को देखकर अथवा उनके सम्बन्ध में सुनकर उत्पन्न होने वाली घृणा या ग्लानि वीभत्स रस की पुष्टि करती है। जुगुप्सा (घृणा) स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से वीभत्स रस का रूप ग्रहण करता है।

उदाहरण-

सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।

खींचत जीमहि स्यार अतिहि आनन्द उर घारत।।

गीध जाँघ को खोदि खोदि के मांस उपारत।

स्वान आंगुरिन काटि-काटि के खात दिदारत॥

स्पष्टीकरण-यहाँ राजा हरिश्चन्द्र श्मशान घाट के दृश्य को देख रहे है।उनके मन में उत्पन्न जुगुप्सा या घृणा स्थायी भाव, हरिश्चन्द्र आश्रय, मुर्दे,माँस और श्मशान का दृश्य आलम्बन, गिद्ध, स्यार, कुत्तों आदि का माँस नोचना और खाना उद्दीपनराजा हरिश्चन्द्र का इनके बारे में सोचना अनुभाव और मोह, ग्लानि, आवेगव्याधि आदि संचारी भाव है, अतः यहाँ वीभत्स रस है।

 

  1. अद्भुत रस

अलौकिक आश्चर्यजनक दृश्य या वस्तु को देखकर सहसा विश्वास नहीं होना और मन में विस्मय उत्पन्न होता है। विस्मय नामक स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से अदभुत रस की दशा प्राप्त होता है।

उदाहरण-

इहाँ उहाँ दुई बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन विसेषा।

देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।।

…. ………………………………………………

देखरावा मातहि निज अदुभुत रूप अखण्ड।

रोम रोम प्रति लागे कोटि-कोटि ब्रह्माड।।

 

स्पष्टीकरण-बालक राम को एक साथ ही दो स्थानों पर देखकर माता कौशल्या के मन में उत्पन्न होने वाला आश्चर्य ही स्थायी भाव है। यहाँ रामआलम्बन है। राम का एक साथ दो स्थानों पर दिखाई देना तथा उनका अखंड रूपउद्दीपन है। कौशल्या का पुलकित होना, वचन न निकलना तथा आँखे बन्द करके राम के चरणों में सिर झुकाना’ अनुभाव है। भ्रान्ति, त्रास, वितर्कआदि ‘संचारी भाव’ है।

 

৪. भयानक रस

किसी भयानक अथवा अनिष्टकारी वस्तु या व्यक्ति को देखने, उससेसंबंधित वर्णन सुनने, स्मरण करने आदि से चित्त में जो व्याकुलता उत्पन्न होती है उसे ‘भय’ कहते हैं। भय नामक स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारीभाव के संयोग से भयानक रस की उत्पत्ति होती है।

स्थायी भाव-भय

आलम्बन विभाव-यात्री आश्रय, अजगर और सिंह

उद्दीपनविभाव-सिंह की भयावह आकृतियाँ और उनकी चेष्टाये

अनुभाव-यात्री को मूर्च्छा आना

संचारी भाव-आवेग, निर्वेद, दैन्य, शंका, व्याधि, त्रास, अपस्मार

उदाहरण-

‘एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय।

विकल बटोही बीच ही, पर्यो मूरछा खाय।।

स्पष्टीकरण-यहाँ पथिक के एक ओर अजगर और दूसरी ओर सिंह की उपस्थिति से वह भय के मारे मूच्छित हो गया है। यहाँ भय स्थायी भाव है। ‘अजगर’ एवं “सिंह”आलम्बन हैं। अजगर और सिंह का दोनों ओर से घेरना उद्दीपन है। पथिक का मूर्छित हो जाना अनुभाव है। इस प्रकार इस दोहे मे भयानक रस है।

 

9.शान्त रस

अभिनव गुप्त ने शान्त रस को सर्वश्रेष्ठ माना है। तत्व ज्ञान की प्राप्ति अथवा संसार से वैराग्य होने पर शान्त रस की उत्पत्ति होती है। जहाँ न दु:ख है नद्वेष है न राग और न कोई इच्छा है ऐसी मनोस्थिति में उत्पन्न रस को मुनियों ने शान्त रस कहा है

स्थायी भाव- निर्वेद

लम्बन विभाव-परमात्मा का चिन्तन एवं संसार की क्षणभंगुरता

उद्दीपन विभाव-सत्संग, तीर्थ स्थलों की यात्रा, शास्त्रों का अनुशीलनआदि।

अनुभाव-पूरे शरीर में रोमांच, पुलक, अश्रु आदि ।

संचारी भाव-धृति, हर्ष, स्मृति, गति, विबोध, निर्वेद आदि।

उदाहरण-

कबहुँक ही यहि रहनि रहौंगो।

श्री रघुनाथ-कृपालु-कृपा ते सन्त सुभाव गहौंगो।।

जयलाभ सन्तोष सदा काहू सों कछु न चहौंगे।

परहित-निरत-निरन्तर मन क्रम वचन नेम निबहौंगे।।

                                         -तुलसीदास

 

स्पष्टीकरण-इस पद में तुलसीदास ने श्री रघुनाथ की कृपा से सन्त-स्वभाव ग्रहण करने की कामना की है। संसार से पूरी तरह से विरक्ति और निर्वद ‘स्थायी भाव’ है।

राम की भक्ति आलम्बन है। साधु-सम्पर्क एंव श्री रघुनाथ की कृपा ‘उद्दीपन’ है। धैर्य, संतोष तथा अचिंता ‘अनुभाव’ है। इस प्रकार यहाँ शांत रस है।

उदाहरण-

कबीर हरि रस यौं पिया, बाकी रही न् थाकि |

पाका कलरा कुम्हार का, बहुरि न् चढ़ई चाकि ||

वात्सलय रस- वात्सल्य नामक स्थायीभाव कि विभावादी के संयोग से वात्सल्य रस कि परिणत होती है; इसके अवयव निम्न है-

स्थायीभाव- वात्सल्य

आलम्बन- पुत्र या सन्तान

आश्रय- माता-पिता

उद्दीपन- सन्तान के क्रिया-कलाप

उदाहरण-

जसोदा हरि पालनें झुलावै |

हलरावे दुलरावै, मल्हावै जोई, कछु, गावै |

Important Topics Of Hindi Grammar (Links)
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क्रिया लिंग वचन
कारक काल पर्यायवाची शब्द
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अनेकार्थी शब्द उपसर्ग एंव प्रत्यय समास
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छंद अव्यय
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